मेघा
तेरे इंतज़ार में ...
छिप छिप अश्रु बहाने वालों
मोटी व्यर्थ लुटाने वालों कुछ सपनों के मर जाने से
जीवन नहीं मरारता है ...
गीली उम्र बनाने वालों
डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बाह जाने से
सावन नहीं मरा कारता है ........... 'गोपाल दास नीरज '
देश में सूखे की मार से निचला तबका अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में खुद से जद्दोजहद कर रहा है। कोई पानी से महज़ कदम भर दूर ही डैम तोड़ रहा है तो कोई पानी देखने को तरस गया है। वजह है की ज़मीं पर अब पानी की किल्लत होती जा रही है लोग मेघा के इंतज़ार में फटी हुई बंज़र मीलों दूर तक आसमान तकते हैं मगर आँखों में प्यास के अलावा और कुछ नहीं दीखता । इस समस्या का समाधान है भी या नहीं इस पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं क्यूंकि विशेषज्ञों का कहना है भविष्य में पानी को तरसेंगे हम। कहा जाता है कि यमुना−गंगा योजना में पानी का समंदर है जो निकाले जाने का इंतजार कर रहा है। मगर एक सवाल जो मेरे मन को कचोटता है कि यदि ऐसा है तो सरकार इस समंदर के अंदर झाँकने के लिए कोई तकनिकी पैमाना तो ज़रूर तैयार किया होता। जो हाल इस बार लातूर सहित देश के ११ राज्यों का है पिछले साल कुछ राज्यों की हालत ऐसी ही थी। ज्यादातर राज्य या जहां तक इसका सवाल है, देश की अर्थव्यवस्था मानसून पर काफी निर्भर है। हम आकाश में काले बादल ढूंढ़ते रहना पड़ेगा। पानी हमारे लिए बहुत मायने रखता है− अनाज उगाने और पीने के लिए।
नेहरू जी ने भाखड़ा बाँध को मंदिर करार दिया था और कहा था कि भारत के परंपरागत मंदिर रहेंगे, लेकिन आर्थिक विकास के लिए हमें नए मंदिरों अर्थात बांध और औद्योगिक परियोजनाओं, का निर्माण करना होगा। यह भाखड़ा बांध पूरे देश को खिला सकता है। लेकिन बड़े बांध बनाना जरूरी नहीं है क्योंकि ये घर−द्वार और चूल्हा−चक्की से उजाड़ दिए लोगों को बसाने की समस्या पैदा करते हैं। छोटे और अलग−अलग जगहों पर बने बांध उतने ही काम के हो सकते हैं, भले ही उनसे बेहतर न हों।पंजाब−हिमाचल प्रदेश में भाखड़ा बांध ने हरियाणा समेत पूरे क्षेत्र को भारत के अनाज भंडार के रूप में बदल दिया है। नर्मदा बांध की ऊंचाई को लेकर मेधा पाटकर के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन का यही निष्कर्ष था। वह सफल नहीं हो पाईं, हालांकि तत्कालीन सरकार की ओर से तैयार कराई हुई जल संसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोज की रिपोर्ट ने कहा था कि बांध से होने वाला फायदा सालों से रहने वाले लोगों को उजाड़ने से होने वाले घाटे के मुकाबले बहुत कम है। लेकिन कई साल बाद बांध बनाया जाने लगा, जब गुजरात ने यह वायदा किया कि उजाड़े गए किसानों और अन्य लोगों की भरपाई के लिए वह जमीन देगी। यह अलग बात है कि राज्य सरकार अपना वायदा पूरा नहीं कर पाई क्योंकि वह उतनी जमीन ढूंढ़ ही नहीं पाई। भारत में सात बड़ी नदियां− गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, नर्मदा, कृष्णा, गोदावरी, कावेरी, और इन नदियों में जल पहुंचाने वाली अनेक छोटी नदियां हैं। इन नदियों के इस्तेमाल ही नहीं, बल्कि उनसे बिजली पैदा करने के लिए नई दिल्ली ने केंद्रीय जल और बिजली आयोग बना रखा है। इसने बहुत हद तक काम भी किया है। लेकिन भारत के कई हिस्सों में इससे ऐसे गंभीर विवाद पैदा हुए हैं जो दशकों से सुलझाए नहीं जा सके हैं।
सूखे का सामना कर रहे छत्तीसगढ़ में पानी पहली बार बड़ी चिंता का कारण बना है। इन दिनों सरकार का लोक सुराज अभियान चल रहा है और मुख्यमंत्री से लेकर सारे मंत्री और सरकार के अधिकारी इस अभियान में लोगों के बीच पहुंचकर उनकी समस्याएं जानने की कोशिश कर रहे हैं। पानी की किल्लत एक बड़ी समस्या के रुप में सामने आई है। पीने के पानी की 90 फीसदी जरुरत भू-जल से पूरी होती है और मौजूदा हालत यह है कि गहरे से गहरे नलकूप तक सूख गए हैं। कुएं, तालाबों से आम निस्तार के लिए पानी बड़ी मुश्किल से उपलब्ध हो पा रहा है। बड़े जलाशयों के जरिए तालाबों में पानी भरने के निर्देश सरकार ने दिए हैं। अभी मई का महीना है और भू-जल स्तर में सुधार के लिए अच्छी बारिश का इंतजार खत्म होने में कम से कम दो महीने लगेंंगे। इन दो महीनों के दौरान पीने के पानी की समस्या वाले इलाकों में प्रशासन को खास ध्यान देना होगा। पानी सिर्फ तात्कालिक चिन्ता का ही विषय नहीं है बल्कि जिस तेजी से भू-जल में गिरावट आ रही है उसे देखते हुए चिंता कल की जरुरतों के लिए पानी बचाने की भी है। छत्तीसगढ़ की जैसी भौगोलिक स्थिति है, उसमें आम उपयोग के लिए पानी की ऐसी किल्लत कभी नहीं देखी गई। छोटे-बड़े नदी-नाले बारहों मास बहते रहते थे। जलवायु परिवर्तन के साथ बारिश कम होने और भू-जल स्तर में लगातार गिरावट आने से अब 44 फीसदी वनक्षेत्र वाले राज्य में भी पानी एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। सरकार ने पानी के संरक्षण के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास शुरू किए हैं। मनरेगा के तहत 80 हजार तालाबों के निर्माण के साथ छोटे नदी-नालों पर एनीकट बनाने तथा बड़े जोत वाले किसानों की जमीन पर सरकारी खर्च से डबरियों का निर्माण कराया जाएगा। उद्योगों में पानी के उपयोग पर भी निगरानी रखने का फैसला किया गया है। रायगढ़, जांजगीर-चांपा और बिलासपुर जिले के विभिन्न इलाकों के अपने लोक सुराज दौरे से लौटने के बाद बुलाई गई बैठक में मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह ने उद्योगों में भू-जल के उपयोग पर निगरानी रखने के निर्देश अधिकारियों को दिए हैं और कहा कि उद्योगों से पानी के उपयोग के संबंध में अनुबंध पत्र भरवाएं और ऐसा न करने वाले उद्योगों के नलकूप बंद कर दें। साफ है कि सरकार की पहली प्राथमिकता आम लोगों को उनकी जरुरत के मुताबिक पानी उपलब्ध कराने की है। वह पानी की किसी भी प्रकार की बर्बादी को रोकना चाहती है। अगर ऐसी ही सोच के साथ आगे भी काम किया गया होता तो पानी की ऐसी समस्या शायद पेश नहीं आती। यह हो सकता है कि सरकार के पास इसके आंकड़ें हों कि पिछले दो-चार दशकों में कितने तालाब और इसी तरह के अन्य छोटे जलस्त्रोत बिक गए। तालाबों को पाटकर उस भूमि का अन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग होने लगा। आज जब पानी की समस्या गंभीर होती दिख रही है तालाबों का महत्व याद आ रहा है। सरकार ने 50 हजार तालाबों के निर्माण की योजना बनाई है। उसे यह भी देखना होगा कि इन तालाबों में बारहों महीने पानी भी रहे।

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