
लम्बे इंतज़ार के बाद पश्चिम बंगाल के साथ देश के 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव अंतिम चरण के मतदान के
साथ बीते गुरूवार को संपन्न हो गया। पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में यह चुनाव अबतक का सबसे लम्बा चुनाव रहा जो छः चरणों में कराया गया । इस बात में कोई संदेह नहीं कि यह विधानसभा
चुनाव पश्चिम बंगाल में अब तक का न केवल सबसे निष्पक्ष था बल्कि इस चुनाव में किसी दल को न तो अपने विरोधियों
को डराने का मौका मिला न ही चुनाव आयोग पर हाथ पर हाथ रखकर मूकदर्शक बने रहने का आरोप
लगाने का बहाना मिला। चुनाव आयोग ने साबित कर दिया कि अगर वह चाहे तो चुनाव में धांधली
मुश्किल ही बही बल्कि असंभव है। चुनाव आयोग द्वारा संपन्न कराया गया यह चुनाव सराहनीय है।
चुनाव में मुक़ाबला सीधे तौर पर वर्त्तमान में सत्ता विराजमान दीदी की तृणमूल और इतिहास में बंगाल के सत्ताधारी वामदल-कॉंग्रेस के गठबंधन के बीच है। लेकिन
सवाल है कि इस चुनाव में जीत आखिर किसकी होगी और पलड़ा किसका और किन करणों से भारी
रहा?निश्चित रूप से कांग्रेस और वामपंथी दलों
में तालमेल होने के बाद तृणमूल की मुश्किल बढ़ी और चुनाव में उसे कड़ी टक्कर आखिरी
चरण तक झेलनी पड़ी। लेकिन तृणमूल अगर एक बार फिर ममता बनर्जी के नेतृत्व में सरकार
में वापस आ जाए तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।
कमज़ोर कड़ी और मज़बूत पक्ष क्या रहा इन सबका इसपर चर्चा करना बहुत ज़रूरी है। तृणमूल कांग्रेस को शारदा चीत फण्ड घोटाला और चुनाव के
ऐन मौके पर अपने बड़े नेताओं के नारद स्टिंग जैसे मुद्दों का सामना करना पड़ा। यह एक बड़ा कारण रहा जिससे उनके विरोधियों को बैठे बिठाए थली परोसा हुआ एक बड़ा चुनावी मुद्दा मिल गया। फिर कोलकाता
शहर में बीचोंबीच एक फ्लाईओवर का गिर जाना तृणमूल के लिए मुश्किलों का कारण बना। इसके
अलावा कई विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी नेताओं की गुटबाजी अपने चरम पर थी। लेकिन इसके बावजूद ममता अपने विरोधियों पर पूरे चुनाव में भारी दिखी। उसका कारण था नारद और शारदा का
प्रभाव ग्रामीण इलाकों में न पड़ना। ग्रामीण इलाकों में सड़क निर्माण, बिजली की अच्छी
उपलब्धता, छात्राओं को साइकल और दो रुपये में एक किलो चावल जैसे कार्यक्रम का प्रभाव
ग्रामीण इलाकों में व्यापक दिखा। फिर ममता
बनर्जी खुद महिला मतदाताओं की पहली पसंद दिखीं। इन सबसे ऊपर तृणमूल ने पिछले पांच वर्षों के दौरान अपने कैडर की एक ऐसी फौज तैयार की जो कांग्रेस-वाम
एकता पर भारी दिखी। हालांकि
कांग्रेस-वामपंथी एकता के कारण मुस्लिम मतदाताओं का वैसा झुकाव तृणमूल के प्रति नहीं था जो 2011 के चुनाव में दिखा था। मुस्लिम मतदाताओं
के वोट दोनों तरफ गए। हालांकि तृणमूल को मुस्लिम मतदाताओं के वोट अधिक मिले हैं।
इधर वामपंथी-कांग्रेस ने तालमेल तो किया लेकिन केरल के चुनाव के कारण शुरू में संयुक्त सभा करने में हिचकिचाहट दिखाई। बाद में राहुल गांधी और बुढदेव भट्टाचार्य एक मंच पर आए, लेकिन तब तक मतदान के चार चरण हो चुके थे। इस गठबंधन के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इनके पास ममता बनर्जी के मुकाबले कोई एक चेहरा नहीं था जो चुनाव में युवाओं को अपनी और आकर्षित कर पाए। इसके कारण सरकार के खिलाफ तमाम मुद्दे होने के बावजूद यह अपने परंपरागत वोटों के अलावा नए मतदाताओं को जोड़ने में कमज़ोर साबित हुए। तृणमूल के वोट बैंक में भी सेंध लगाने में कामयाब नहीं हो पाए।
इधर वामपंथी-कांग्रेस ने तालमेल तो किया लेकिन केरल के चुनाव के कारण शुरू में संयुक्त सभा करने में हिचकिचाहट दिखाई। बाद में राहुल गांधी और बुढदेव भट्टाचार्य एक मंच पर आए, लेकिन तब तक मतदान के चार चरण हो चुके थे। इस गठबंधन के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इनके पास ममता बनर्जी के मुकाबले कोई एक चेहरा नहीं था जो चुनाव में युवाओं को अपनी और आकर्षित कर पाए। इसके कारण सरकार के खिलाफ तमाम मुद्दे होने के बावजूद यह अपने परंपरागत वोटों के अलावा नए मतदाताओं को जोड़ने में कमज़ोर साबित हुए। तृणमूल के वोट बैंक में भी सेंध लगाने में कामयाब नहीं हो पाए।

वहीँ भाजपा की चर्चा से चुनावी गलियारा नदारद ही दिख रहा है। हर तरफ चर्चा में दीदी ही सबकी पसंद नज़ार आरही है। इस चुनाव में जीत या हार इस बात पर भी निर्भर करेगा कि भाजपा द्वारा 2014 के लोकसभा चुनाव में हासिल 17 प्रतिशत वोट में से ममता या विरोधी कितने अपने पाले में खिंच सकते हैं ।
बहरहाल किसी की भी जीते हो या हार, कोई भी यह
शिकायत नहीं कर सकता कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हुए या चुनाव में धांधली हुई। चुनाव आयोग ने यह साबित कर दिया कि कितनी भी दबंगई क्यों न हो व्यवस्था से ऊपर होना मुश्किल है ही नहीं नामुमकिन है ।


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