पहाड़ में फिर से रावत सरकार
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मार्च से मई आ गया, लेकिन उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने की तमाम दलीलों से बीजेपी
पीछे नहीं हटी। जिन नौ विधायकों के दम पर उसने दलील दी कि सरकार अल्पमत में आ गई है,
उनकी सदस्यता तक चली गई। कोर्ट में 9 विधायक अपने आपको साबित नहीं कर पाए। कांग्रेस
के ज़माने में राष्ट्रपति शासन के दुरुपयोग का विरोध करते रहने वाली बीजेपी इस बार ख़ुद
फंस गई। मोदी सरकार ने जितनी भी दलीलें और धाराओं का सहारा लिया, कोर्ट में कुछ नहीं
टिका। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बीजेपी इस मामले में लगातार हारते चली गई।
सदन में जब विश्वासमत हुआ उसमें भी हार गई। विश्वास मत सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी
में कराया, यहां तक कि जब तक कोर्ट के भीतर लिफाफा नहीं खुला नतीजे के बारे में दावे
तो किये जाते रहे, मगर उनकी कोई मान्यता नहीं थी। लिफाफा खुलते ही देहरादून में कांग्रेस
खेमे में उत्साह बढ़ गया। हरीश रावत के पक्ष में 33 मत पड़े और बीजेपी के पक्ष में
28।
हरीश
रावत को फिर से शपथ लेने की ज़रूरत नहीं है। अदालत का आदेश आते ही केंद्रीय मंत्रिमंडल
की बैठक हुई और राष्ट्रपति शासन हटाने का फ़ैसला कर लिया गया। बीजेपी ने संवैधानिकता,
नैतिकता और भ्रष्टाचार के आरोपों के दम पर राष्ट्रपति शासन को हर स्तर पर जायज़ ठहराने
का प्रयास किया लेकिन सहयोगी संघवाद का नारा देने वाली बीजेपी अदालत में अपनी बात साबित
नहीं कर पाई। एक महीने से ज्यादा समय तक एक चुनी हुई सरकार को बर्खास्त तक कई स्तरों
पर सार्वजनिक बहसों के ज़रिये वक्त भी बर्बाद हुई। दो-दो बार स्टिंग ऑपरेशन का मामला
सामने आया, जिसमें रावत पर पैसे से सरकार बचाने के प्रयास का आरोप भी लगा। स्टिंग ऑपरेशन
से जो सवाल उठे और राष्ट्रपति शासन लगाने को लेकर जो सवाल उठ रहे थे, दोनों का कोई
संबंध नहीं था। लेकिन बीजेपी स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिये राष्ट्रपति शासन का बचाव करने
का हरसंभव प्रयास करती रही। मशहूर वकील हरीश साल्वे ने जब स्टिंग ऑपरेशन का हवाला दिया
तो उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि अगर राष्ट्रपति भ्रष्टाचार के आरोपों के आधार पर राज्यों
में अपना शासन थोपने लगेंगे तो कोई राज्य सरकार पांच मिनट से ज्यादा नहीं चल पाएगी।
बहरहाल स्टिंग ऑपरेशन के मामले की सीबीआई जांच भी करने लगी है। सब कुछ तेज़ी से हुआ
मगर घूम फिर कर रावत के दरवाज़े पहुंच गया। वे अब फिर से मुख्यमंत्री हैं। तब कांग्रेस
के थे अब उन्हें मायावती का शुक्रिया अदा करना पड़ रहा है। मायावती कह रही हैं कि यह
फैसला सिर्फ उत्तराखंड तक सीमित है। उत्तर प्रदेश में वे कांग्रेस के साथ नहीं जाएंगी।
राष्ट्रपति
शासन लगने के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक ब्लॉग लिखा था। जिसकी पहली पंक्तियों
में से एक पंक्ति यह थी कि राष्ट्रपति शासन लगाने का फ़ैसला राष्ट्रपति ने अपनी राजनीतिक
समझदारी और अपने सारे रखे गए दस्तावेज़ों के आधार पर लिया। यही दलील केंद्र सरकार के
वकील ने हाईकोर्ट में दी। हाईकोर्ट ने कह दिया कि
लोग
ग़लत फ़ैसले ले सकते हैं, चाहे वो राष्ट्रपति हों या जज... ये कोई राजा का फ़ैसला नहीं
है, जिसकी न्यायिक समीक्षा ना हो सकती हो।
केंद्र
सरकार ने राष्ट्रपति की मंज़ूरी के नाम पर अपने फैसले का खूब बचाव किया, जबकि प्रस्ताव
तो केंद्रीय मंत्रिमंडल से पास होता है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी एक बार विचार के
लिए भेज सकते थे। जो उन्होंने नहीं भेजा। एक बार भी सवाल नहीं किया। अगर मंत्रिमंडल
से दोबारा प्रस्ताव आता तो उन्हें हां करना ही होता। सवाल यह उठ रहा है कि उन्होंने
दोबारा विचार के लिए क्यों नहीं भेजा। फिर भी केंद्र सरकार अदालत और अदालत के बाहर
चैनलों में यह दलील देती रही कि राष्ट्रपति ने दस्तावेज़ देख लिये हैं। उत्तराखंड हाईकोर्ट
का फैसला इस मामले में ऐतिहासिक है कि उसने केंद्र सरकार के उस केंद्रीय तर्क को ही
धराशायी कर दिया जिसके सहारे राष्ट्रपति शासन का बचाव किया जा रहा था। 'ये कोई राजा
का फैसला नहीं है, जिसकी न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती।' ये पंक्ति आने वाले समय में
भारतीय लोकतंत्र के राजनीतिक इतिहास में ज़माने तक गूंजेगी। जब भी कोई राष्ट्रपति राष्ट्रपति
शासन लगाने के प्रस्ताव पर दस्तख़त करेंगे एक बार इसे याद करेंगे। उनके सलाहकार याद
दिलायेंगे। आप राजा नहीं हैं। आप जो फैसला ले रहे हैं उसकी अदालत में समीक्षा हो सकती
है। विपक्ष के नेता और संविधान के जानकार सब राष्ट्रपति पर भी सवाल उठा रहे हैं। पब्लिक
में आकर राष्ट्रपति अपना बचाव नहीं कर सकते मगर पब्लिक तो सवाल करेगी। राष्ट्रपति ही
नहीं राज्यपाल की भूमिका की भी समीक्षा होनी चाहिए। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्यपाल
के बारे में भी कहा कि वो निष्पक्ष होता है। केंद्र का एजेंट नहीं होता।
आप
संविधान के जानकार और सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन हैं। आप कई मामलों
में सुप्रीम कोर्ट के सलाहकार भी रहे हैं। राजू रामचंद्रन का कहना है कि इस पूरे मामले
में राष्ट्रपति की भूमिका से निराश हैं। राष्ट्रपति को अपनी विवेकाधीन शक्तियों का
इस्तेमाल करना चाहिए था। इस मामले में उनकी भूमिका भले ही सीमित हो। अरुणाचल प्रदेश
में राष्ट्रपति शासन के मामले में उन्होंने सवाल पूछे थे, लेकिन उत्तराखंड के मामले
में उन्होंने कोई सवाल नहीं उठाए जबकि फ्लोर टेस्ट होने वाला था। आप वाजपेयी सरकार
में अटॉर्नी जनरल रहे सोली सोराबजी हैं। जाने माने संविधानविद सोराबजी ने कहा कि उत्तराखंड
में राष्ट्रपति शासन लगाने के मामले में मोदी सरकार को जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए थी।
इससे ये संदेश गया कि केंद्र सरकार फ़्लोर टेस्ट नहीं होने देना चाहती। सोराबजी रामचंद्रन
की तरह सख़्त नहीं हैं, मगर कहा कि कोई कह सकता है कि राष्ट्रपति को सरकार के पास फाइल
वापस भेज देनी चाहिए थी, लेकिन क्या होता अगर सरकार फाइल वापस भेज देती। राष्ट्रपति
को दस्तख़त करने पड़ते... राष्ट्रपति ने कुछ भी ग़लत नहीं किया... कोर्ट अब एक्टिव हैं
इसलिए सरकार को सावधानी से काम करना चाहिए था।
1994
में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने एस आर बोम्मई केस में फैसला दिया कि अतिविशिष्ट
परिस्थिति में ही राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल होना चाहिए।
केंद्र सरकार के राजनीतिक हित के लिए कभी नहीं होना चाहिए। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महीने
भर से कम समय में सुनवाई कर फैसला दिया। अपने आप में इतिहास है। वो भी पुरानी सरकार
के रहते फैसला दिया है। ऐसा नहीं कि दूसरी सरकार बन गई या चुनाव होकर कोई और सरकार
आ गई फिर फैसला आया। इसलिए उत्तराखंड हाईकोर्ट का फैसला और बाद में सुप्रीम कोर्ट का
फैसला अब पढ़ाया भी जाएगा। पर इसके लिए कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एस आर बोम्मई का
शुक्रगुज़ार होना चाहिए जो अपनी सरकार की बर्खास्तगी के लिए अदालती लड़ाई लड़े। ये और
बात है कि उन्हें इस लड़ाई का लाभ नहीं मिला। जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तब उनकी
सरकार जा चुकी थी। तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार ने बोम्मई की सरकार बर्खास्त की
थी। आज कांग्रेस को बोम्मई की उस लड़ाई से लाभ हुआ है। हरीश रावत की सरकार बच गई है।
मगर इस लड़ाई में हरीश रावत ने भी जोड़ दिया। क्या विडंबना है। राष्ट्रपति शासन के मामले
में कांग्रेस नैतिक रूप से किसी बहस में टिक नहीं पाती है लेकिन उसने उत्तराखंड के
बहाने ऐसी बहसों के लिए नैतिक बल हासिल कर लिया है। हरीश रावत भी इस मामले में संवैधानिक
इतिहास का हिस्सा बन गए। राहुल गांधी ने कहा कि वो गलत कर रहे थे। हम सही कर रहे थे।
लोकतंत्र की जीत हुई है।
इस
साल 26 जनवरी के दिन अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया गया। कांग्रेस ने इसे
भी चुनौती दी मगर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में सुनवाई चलती रही और अरुणाचल प्रदेश
में नई सरकार बन गई। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी तक नहीं आया है। हमने राष्ट्रपति
शासन के बारे में देश के कानून मंत्री सदानंद गौड़ा के बयान को गूगल में खूब सर्च किया।
हो सकता है मुझे न मिला हो इसलिए दावे से नहीं कह रहा मगर कानून मंत्री को छोड़ बाकी
तमाम नेताओं के बयान ज़रूर मिले। क्या ये अजीब नहीं है कि इतनी बड़ी संवैधानिक बहस हो
गई और कानून मंत्री का एक ट्वीट तक नहीं है। क्या ये मामला राजनीतिक ही था। सदानंद
गौड़ा ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद सॉयल हेल्थ कार्ड और बेटी बचाओ
बेटी पढ़ाओ पर ट्वीट किया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली का ब्लॉग मिला. जिसे उन्होंने
हिन्दी और अंग्रेजी में लिखा था। उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के एम जोसेफ़ और
जस्टिस वी के विष्ट ने सुनवाई के दौरान कहा था कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के
मामले में केंद्र सरकार को निष्पक्ष होना चाहिए लेकिन वो प्राइवेट पार्टी जैसा व्यवहार
कर रही है। हम आहत हैं कि केंद्र सरकार ऐसा व्यवहार कर रही है। आप कोर्ट के साथ ऐसा
खेल खेलने की कैसे सोच सकते हैं।
चीफ
जस्टिस के एम जोसेफ़ का अब तबादला हो चुका है। लेकिन उनकी बेंच ने राष्ट्रपति शासन के
मामने में एक पैमाना तय कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी उसी दिशा में रहा है।
इस फैसले ने कई तरह के आरोपों और पार्टी के भीतर अपने विरोधियों से घिरे हरीश रावत
को नया जीवनदान दिया है।
हरीश
रावत के लिए ये एक ऐसी सियासी लड़ाई साबित हुई जिसमें उन्होंने एक ही वार में मोदी सरकार
की कोशिशों और पार्टी में अपने सियासी विरोधियों को चित कर दिया। पूर्व मुख्यमंत्री
विजय बहुगुणा और पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत के साथ नौ विधायक ना इधर के रहे, ना उधर
के। कांग्रेस के इन बाग़ियों के आधार पर ही बीजेपी ने राज्य में हरीश रावत सरकार को
पटखनी देने की योजना बनाई थी। बाग़ियों ने हरीश रावत सरकार को बर्ख़ास्त करने के लिए
राज्यपाल को दिए ख़त में बीजेपी के लेटर पैड पर हस्ताक्षर किए। वो बीजेपी के नेताओं
के साथ विमान से देहरादून से दिल्ली पहुंचे और बीजेपी के नेताओं के साथ बसों में कभी
गुड़गांव तो कभी जयपुर में घूमते रहे। फाइव स्टार होटलों में ठहरे। दिल्ली में हरीश
रावत के ख़िलाफ़ स्टिंग जारी कर उन पर भ्रष्टाचार का आरोप भी लगाया, लेकिन कुछ काम नहीं
आया। विधानसभा में भी हार का मुंह देखना पड़ा और उत्तराखंड हाइकोर्ट में भी। उत्तराखंड
हाइकोर्ट ने इन बाग़ियों की याचिका खारिज कर उनकी विधायकी रद्द करने के स्पीकर के फ़ैसले
पर मुहर लगा दी। हाइकोर्ट ने कहा कि उन विधायकों ने अपने काम से ख़ुद ही राजनीतिक दल
से अपनी सदस्यता छोड़ देने का काम किया है। अब इन बाग़ियों के सामने विकल्प बहुत ही कम
बचे हैं। कई के सियासी करियर संकट में पड़ गए हैं। ना कांग्रेस में वापसी करते बनता
है, ना बीजेपी में शामिल होते। हरीश रावत की जीत के बाद बीजेपी के लिए भी उनकी कोई
ख़ास अहमियत नहीं रह गई है।
1993
में पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़ को वहां की सुप्रीम कोर्ट ने फिर से बहाल कर दिया था।
जिसे राष्ट्रपति ग़ुलाम इसहाक़ ख़ान ने बर्ख़ास्त कर दिया था। दोनों मुल्कों में वो पहली
सरकार थी जो राष्ट्रपति के द्वारा बर्ख़ास्तगी के बाद बहाल हुई थी। फ़ैसले के बाद नवाज़
शरीफ के एक मंत्री ने कहा था कि न ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के
रहे। 18 मार्च से 11 मई आ गया। उत्तराखंड जहां से चला था वहीं पहुंच गया। इस उत्तराखंड
के कारण इतना समय गया कि समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन एक दिन राज्य सभा में
झुंझला गईं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के कारण कई ज़रूरी मसलों पर चर्चा नहीं हो रही
है।
(रवीश कुमार)
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