वो फैज़ाबाद के जेल में कटी आखिरी रात, जब हिन्दुस्तान की आजादी का सपना संजोए अशफ़ाक अपनी ज़िन्दगी की आखिरी रात गुज़ार रहे थे तब उनके मन में जो चल रहा था वो इस कविता से झलक रही है| अशफ़ाक को फांसी होनी थी और अपने बुलंद इरादों को शब्दों में पिरो कर अपनी डायरी में सजा गए | राम प्रसाद बिस्मिल का ज़िक्र करके फिर से जन्म लेने की ख्वाहिश भी ज़ाहिर की और आज़ाद हिन्दुस्तान का सपना उसी आँखों में बुनकर गहरी नींद में सो गए|
“जाऊँगा खाली हाथ मगर,यह दर्द साथ ही जायेगा;
जाने किस दिन हिन्दोस्तान,आजाद वतन कहलायेगा।
बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं, फिर आऊँगा-फिर आऊँगा;
ले नया जन्म ऐ भारत माँ! तुझको आजाद कराऊँगा।।
जी करता है मैं भी कह दूँ, पर मजहब से बँध जाता हूँ;
मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कह पाता हूँ।
हाँ, खुदा अगर मिल गया कहीं, अपनी झोली फैला दूँगा;
औ’ जन्नत के बदले उससे, यक नया जन्म ही माँगूँगा।।”
..... अशफाकुल्लाह खान

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